Friday, 29 September 2017

गरीबी की जिन्दगी

गरीबी की जिन्दगी 

पहले जब भी में किसी भी गरीब को देखता तो बड़ा अफ़सोस होता ..सोचता कब और कैसे इसकी दरिद्रता दूर करूँ ? भारत में रहते हुए मेने उसकी चारो दिशाओ में भ्रमण किया और गावं , देहात , शहर और कस्बो की जिन्दगी को काफी करीब से देखने समझने का मौका मिला ....मेरी सहानभूति हमेशा गरीबो और कमजोरो के प्रति रहती ...पर जबसे मेने पश्चिम की जिन्दगी को करीब से देखा और समझा ... मेरी सोच में परिवर्तन आने लगा ...


आप में से कुछ लोग मेरी सोच से असहमत हो सकते है  ..पर जो सच्चाई है उसे हम यूँ झुटला नहीं सकते ..मानवता के नाते हम भले ही कितनी बड़ी बड़ी बाते करे ...पर अंत में सच के कडवे झूट को हमें पीना ही पड़ेगा ...


इक बात जो मेने अपने अनुभव में देखी ..वो यह की ...जिन मुल्को में सर्दी ज्यादा नहीं पड़ती या यूँ भी कह सकते है ..जंहा गर्मी पड़ती है वंहा गरीबी ज्यादा होती है ......इसके कई कारण है ...ठन्डे देशो में जिन्दगी यूँ आसन नहीं होती ..मौत आपका हर पल स्वागत करने के लिए तैयार रहती है ..वंहा जिन्दा रहने के लिए कुछ मूल भूत सुविधाओ जैसे ..पक्का घर , बिजली , गर्मी , पानी , सडक , दूरसंचार , यातयात के साधन आदि का होना अनिवार्य है

 आपकी मर्जी है ...किसी भी खुली जगह इक चादर डाल कर अपना रेन बसेरा बना ले ...कोई भी खाली जगह देख अपनी नित किर्या को निबटा ले ...ना तो कोई कानून  है ...ना कोई उन्हें मानने वाला ..अगर कोई आवाज करे भी तो ..बस गरीब होने भर से सारे खून माफ़ ...

शायद इतना भी होता तो भी जीना इतना आसन ना होता ...पर कंही भी किसी को काम का मिल जाना ....आदमी किसी फैक्ट्री में कोई काम ढूंड लेता ..नहीं तो सडक पे या फूटपाथ पे अपनी दुकान सजा लेता ..यह ना भी हो तो कोई ठेला ही पकड लो ..हो गया रोटी पानी और धंधे का जुगाड़ ...


अगर शादी शुदा है तो ..घरवाली को काम की चिंता ही नहीं .... हर घर में कामवाली बाई की वैकेन्सी का बोर्ड टंगा मिल जाएगा ...अब रहने की सुविधा हल ...नौकरी या रोजगार की समस्या हल ..तो हो गई जिन्दगी आसन...


बस यही आसन जिन्दगी है सारी बीमारियों और फसाद की जड़ ...सरकार का ढीला कानून ..आपको कंही भी रहने , नित्य कर्म करने और रोजगार करने की आजादी देता है ...फिर यही ढीला कानून आपकी जिन्दगी को इक गिली लकड़ी की तरह रोज जलाता है ...


लाखो लोग इन ठुल मुल रवैये की वजह से गावं देहात छोड़ शहर भागे चले आते है और फिर अपनी और वंहा पर रहने वालो की जिन्दगी को धीरे धीरे इक अँधेरे कुए की तरह ले जाते है ...


झुग्गी झोपडी देखते ही देखते इक विकराल कालोनी का रूप धारण कर लेती है .... जन्हा कोई मूल भूत जन सुविधा जैसे सडक , बिजली , पानी , स्कूल , हॉस्पिटल और कानून वयवस्था नहीं होती...फिर शुरू होता है राजनीती का खेल ...


इक कालोनी जिसका मूल आधार ही गैर क़ानूनी है ..मानवता के नाम पे राजनितिक आखाडा बन जाती है ...कुछ छोटे मोटे नेता अपनी नेतागिरी चमकाते हुए उन्हें राशन कार्ड , पहचान पत्र और वोट कार्ड बनवाने के नाम पे इसे इक वोट बैंक में बदल देते है .... जब इस वोट बैंक को अपनी ताकत का अंदाजा होता है  ..फिर शुरू होता इक नया आन्दोलन ..की सरकार निकम्मी है जनता के लिए कुछ नहीं करती ?


अगर गौर से देखे तो गर्म देशो में गरीब की जिन्दगी बहुत ही आसन होती है ..इसलिए वोह हर जगह अपने अस्तित्व को बचा ले जाता है

 कांश उस वक़्त हमने कुछ ठोस कदम उठाये होते तो आज शायद कानून में...  मानवता की दुहाई के नाम पे इतना लचीलापन ना होता और गरीब की जिन्दगी भी कुछ कठिन होती तो शायद गरीब का इतना ज्यादा फलना फूलना मुमकिन ना होता और जब गरीब ही कम होता तो गरीबी भी कम दिखती
जब इन्सान की आम जिन्दगी कठिन होती है .. तभी वोह संघर्ष करता है और जीवन में जीने के नए आयाम धुन्ड़ता है
 पश्चिम में हड्डियों को कड़का देने वाली ठण्ड ...किसी गरीब को किसी झुग्गी में जिन्दा नही रहने देती ...वंहा का सख्त कानून यूँ सडक पे उसे कोई टोकरा या ठेला लगाने नही देता ...
मौसम और कानून मिलकर उसे मजबूर करते ..की वोह दस बार सोचे और तब कुछ करे ..नाकि यूँही बिना सोचे समझे अपनी पोटली लिए गावं से गुजरने वाली ट्रेन पकड़ ... किसी भी शहर की तरफ रुखसत हो ले ...

सख्त जिन्दगी और कानून उसे मजबूर करते है की वोह जन्हा है उसे बेहतर बनाने के लिए प्रयत्न करे....ना की इक आसन जिन्दगी के लिए शहरो का पलायन करे ....

शायद यहि आसन जिन्दगी इक गरीब को जीवन भर गरीबी में जीने को मजबूर कर देती है ....की उसे जिन्दा रहने या अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ता ...यह आसन जिन्दगी गरीब मुल्को में उनकी जनसंख्या में बेहिसाब बढ़ोतरी करती जाती है ..क्योकि ..
इसलिए किसी गरीब को मानवता के नाम पे भीख दे कर उसे जीवन भर के लिया अपाहिज ना बनाये ... और सरकार भी किसी गैरकानूनी बस्तियों को पक्का ना करे और किसी को भी सिर्फ मानवता के नाम पे सडक या फूटपाथ पे धंधा चलाने से रोकना चाहिए ... जब तक आदमी पुरे संघर्ष से नहीं गुजरता ..वोह अपना बल और बुद्धि का सर्वश्रेस्थ उपयोग नहीं करता ...

किसी ने सच ही कहा है ...की ... सोना जितना तपता है उतना ही निखरता है और ....

 गरीबी में जिन्दा रहना सबसे आसान है ....पर गरीबी में जिन्दगी का सफर सबसे मुश्किल
“आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है
जी हा दोस्तों बस्तों में देकः जब तो गरीबी की जिन्दगी काफी मुस्किल हे लिकिन नामुमकिन नहीं 

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